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अपराध का महिमामंडन घातक

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संपादकीय

अपराध और हिंसा मौजूदा दौर में युवाओं के लिए आकर्षण का विषय बनता जा रहा है। यह किसी भी सभ्य समाज के लिए घातक है। गुंडई न केवल समाज के लिए घातक है, बल्कि यह नैतिक रूप से भी समाज को कमजोर बनाता है। आज हम जिस दौर से गुजर रहे हैं, वहां फिल्मों से लेकर असल जिंदगी तक में हिंसा और अपराध की वारदातों को लेकर एक अजिब प्रकार का रोमांच देखा जा रहा है। गुंडई को वैध मानने की परंपरा ने जन्म ले लिया है। राजनीतिक दल और मीडिया भी इस विषय पर खुलकर बोल नहीं पा रही है।

गुंडा पहले रंगदार कहलाये जाते थे। अब तो राजनेता से लेकर समाजसेवा का दंभ भरने वाले कुछ लोगों की दंबगई भी रंगदार के श्रेणी में आ गई है। हम देखते है कि बीते अनेक वर्षों में दबंगई करने वाले चेहरों ने राजनीतिक विकास में एक ऊंचा मकाम हासिल कर लिया है। अनेक राजनीतिक दलों के पास हमें गुंडों की फ़ौज भी दिखाई पड़ती है। गुंडे अक्सर हिंसा, आक्रमण-प्रहार, झगड़े-झड़प, दंगे-फ़साद उकसाने और करने में बहुत सहायक होते हैं। टेलीविजन पर हमें वाग्हिंसा दिखती है। हिंसा तो गुंडई का अनिवार्य पक्ष है।

हमारे समाज में हर दिन इंसानियत, सहानुभूति और संवेदनशीलता की कमी देखी जा रही है। वहीं दूसरी ओर हिंसा के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है। सभ्य समाजों की व्याख्या ढहने लगी है। यह मिथक अब ध्वस्त हो चुका है कि हम एक शांतिप्रिय और अहिंसक समाज है। यह विडंबना ही है कि हम आये दिन हो रही हिंसक वारदातों को लेकर चिंतीत नहीं है। ज़्यादातर विद्वत्ताहीन धर्मनेता इस गुंडई की कार्रवाइयों पर मुखर होकर निंदा नहीं करते।

हमारा समाज अब नैतिक संकट में दिखाई पड़ता है। और उसमें इतना साहस नहीं बचा है कि वह इन अनाचारों का विरोध कर सकें। गुंडई को तो अब व्यापक राजनीति में सम्मान की जगह मिलने लगी है। हमारे संविधान-निर्माताओं ने यह कतई नहीं सोचा था कि अमृतकाल में गुंडई का हमारे लोकतंत्र में ऐसा वर्चस्व कायम होगा। हमारे लोकतंत्र का ढांचा धीरे-धीरे दरकने लगा है।

बच्चों में लालन-पालन से ही हिंसा का बीज बोया जा रहा है। महाराष्ट्र में नाबालिगों द्वारा प्रति वर्ष 4406 अपराध किए जाते हैं। अर्थात महीने में लगभग 367 और दिन में 12 अपराध नाबालिगों द्वारा होते हैं। 12वीं कक्षा में पढ़ने वाले दो दोस्त, जो रोज़ मिलते हैं, के बीच एक दिन वाहन पार्किंग को लेकर विवाद होता है। विवाद का दर्द इतना गहरा होता है कि नाराज लड़का कुछ दिन बाद अपने मित्र को चाकू से हत्या कर देता है। एक तुच्छ कारण पर, ऐसा अपराध एक किशोर द्वारा, जो कानून के अनुसार वयस्क भी नहीं है, अपने ही उम्र के दूसरे किशोर की हत्या करता है। बारामती में हाल ही में घटित यह घटना पढ़कर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को गहरा सदमा तो लगेगा ही। लेकिन उसके बाद मन में एक सवाल उठेगा, ‘हम वास्तव में कहां जा रहे हैं?’ समाज के रूप में इस सवाल का उत्तर देना अब अत्यंत महत्वपूर्ण है। बारामती में हुई हत्या की यह घटना, जिसमें अल्पवयीन शामिल हैं, अधिक गंभीर है। इसमें कोई संदेह नहीं है।

नाबालिगों द्वारा किए जा रहे अपराध, विशेषकर 16 से 18 वर्ष के बच्चों द्वारा, बढ़ते जा रहे हैं। यह चिंताजनक है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2022 के आंकड़े बताते हैं कि उस वर्ष देशभर में कुल 31,910 अपराध नाबालिगों ने किये। इनमें से 16 से 18 वर्ष के बच्चों द्वारा किए गए अपराधों का प्रतिशत 75 है। चोरी, चोट पहुंचाने वाले हमले, डकैती जैसे अपराधों में अधिकतम हिस्सेदारी है। हत्या के अपराधों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। लेकिन वह भी नगण्य नहीं है। खास बात यह है कि यह आंकड़े यह भी बताते हैं कि राज्यों के बीच, अल्पवयीनों द्वारा सबसे अधिक 4406 अपराध महाराष्ट्र में हुए हैं। यदि हम थोड़ा गणित करें, तो इन आंकड़ों की गंभीरता और अधिक स्पष्ट होती है।

नाबालिगों द्वारा बड़े पैमाने पर और गंभीर प्रकार के अपराध किए जाते हैं। इसे मान्यता देने के बाद, ‘हम समाज के रूप में वास्तव में कहां जा रहे हैं?’ और ‘क्या हिंसा बचपन से ही रुजती है?’ जैसे सवाल केवल प्रासंगिक नहीं हैं, बल्कि अत्यंत तात्कालिक भी हैं, इसे मानना आसान हो जाएगा। किसी तुच्छ कारण पर हुए झगड़े के कारण 17 वर्षीय बच्चे को इतना गुस्सा आ सकता है कि वह अपने मित्र की हत्या कर देने की सोचता है। इसके पीछे की मानसिकता के पहलुओं का अध्ययन करना बहुत जटिल है। अपराध करने वाले अल्पवयीन ने अपने बचपन में जो हिंसा का अनुभव किया है, वह विभिन्न माध्यमों से। अपने या आस-पास के घरों से आने वाले हिंसक दृश्यों और माता-पिता की लापरवाही से लेकर गलत संगतों तक कई आयामों में समाहित होता है।

शहरी क्षेत्रों की स्थिति यह है कि झुग्गियों से लेकर उच्च वर्ग के घरों तक, समर्पित माता-पिता मिलना बहुत मुश्किल है। माता-पिता की जीवन यापन, करियर की आकांक्षाओं को पूरा करने, परिवार को ‘सुख’ देने की दौड़ इतनी प्रतिस्पर्धात्मक होती है कि वे अपने बच्चों के साथ कुछ समय बिताने की फुर्सत भी नहीं निकाल पाते। भले ही इसके लिए समय निकालना स्वीकार कर लिया जाए, लेकिन कुल मिलाकर परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए समय की कमी का सामना करना पड़ता है। और इससे संबंधित प्रश्न कई माता-पिता के सामने हैं। इस स्थिति में बच्चों का विकास, उन्हें मिलने वाले या न मिलने वाले संगत, शिक्षा और विभिन्न माध्यमों की उपलब्धता पर छोड़ दिया गया है। जिससे जो कुछ भी इकट्ठा होता है, वह उनके व्यक्तित्व में समाहित होता है।

इस प्रकार, बहुत छोटे उम्र से ही अश्लील गालियां देने से लेकर हत्या तक की घटनाएं उनके आस-पास घटित होती रहती हैं। किसी भी आर्थिक स्तर के लिए यह एक अपवाद नहीं है, यह भी ध्यान देने योग्य है। क्योंकि, दिल्ली में घटित ‘निर्भया’ मामले से लेकर पुणे में पोर्श दुर्घटना तक के अपराधों में एक समान धागा है। वह है हिंसा के प्रति कोई आपत्ति नहीं होने की मानसिकता।

इस मानसिकता का सामना करने की हमारी तैयारी कितनी है, इस पर अल्पवयीनों द्वारा होने वाले अपराधों पर नियंत्रण निर्भर करता है। आस-पास फैली हुई हिंसा के विभिन्न रूपों का किशोर एवं युवा मन में कैसे परिवर्तन होता है। और उसका निचोड़ कैसे निकलेगा, यह एक गंभीर प्रश्न है। क्या यह एक भयानक विस्फोट बनेगा, या इन कठिनाइयों को सुलझा लिया जाएगा, इसका उत्तर छिपा हुआ है।

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