■ बहुत देर से दर पे आँखें लगी थीं, हुज़ूर आते-आते बहुत देर (15 वर्ष) कर दी…
■ आत्महत्या प्रयास के लिए ज़िम्मेदार अफसरों पर क्या कार्रवाई करेंगे पालकमंत्री और जिलाधीश?
चंद्रपुर.
वर्ष 1985 में आई फ़िल्म तवायफ में आशा भोसले द्वारा गाया हुआ गीत – ‘बहुत देर से दर पे आँखें लगी थीं, हुज़ूर आते-आते बहुत देर कर दी…’ आज चंद्रपुर ज़िले के कुसुंबी गाँव के 19 आदिवासी परिवारों का विलाप बन चुका है। जब इन परिवारों के 5 गरीब ग्रामीणों ने SDO कार्यालय में ज़हर गटका, मौत की दहलीज़ पर पहुँच गए, तब जाकर इनके 15 वर्षों के संघर्ष की दखल ली गई। अब ज़िले के पालकमंत्री डॉ. अशोक उइके एवं ज़िला प्रशासन इन आदिवासियों के मसले को तत्काल हल करने की गवाही देते फिर रहे हैं। लेकिन 15 सालों से बेरुख़ी बरतने वाले शासन व प्रशासन में बैठे गैर-जिम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ क्या पालकमंत्री एवं जिलाधीश कोई कार्रवाई कर पाएंगे? या वही पुराने ढर्रे पर काम चलेगा? लीपापोती, दोषियों को बचाना, लंबे-लंबे आश्वासन!
इन्हें आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाले दोषियों के ख़िलाफ़ पालकमंत्री डॉ. उइके एवं जिलाधिकारी वसुमना पंत क्या कदम उठाने वाले हैं? यह बात जनता को क्यों नहीं बता पा रहे हैं? यह सबसे बड़ा सवाल है।
चूंकि यह मामला अब न्यायालय में न्यायप्रविष्ट हैं, ऐसे में कोर्ट का फैसला आने के पूर्व ही पालकमंत्री के आश्वासन पर प्रशासन कैसे अमल कर पाएगा, यह सोचनी वाली बात है।
■ 15 साल का इंतजार और जहर पीने की नौबत
पिछले 15 वर्षों से 19 कोलाम आदिवासी किसान अपनी जमीन के मुआवजे के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते रहे, लेकिन न्याय न मिलने के कारण आखिरकार उन्होंने उपविभागीय अधिकारी (SDO) कार्यालय में जहर ग्रहण कर विरोध जताया।
■ संघर्ष का चेहरा बने किसान, 79 हेक्टेयर जमीन पर विवाद
लचू आत्राम, जयराम कुलमेथे, बालाजी सिडाम, मारोती तलांडे और जंगू पेंदोर सहित अन्य किसान इस संघर्ष का प्रतीक बन गए हैं। उनका आरोप है कि उनकी 79 हेक्टेयर जमीन अल्ट्राटेक(मानिकगढ़) सीमेंट कंपनी के कब्जे में है, लेकिन 15 वर्षों से उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिला।
■ कंपनी, राजस्व और भूमि अभिलेख विभाग के दावे आमने-सामने
जहां किसानों का कहना है कि गडचांदूर मानिकगढ़ सीमेंट कंपनी ने खनन के लिए जमीन ली है, वहीं राजस्व प्रशासन के पास इसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं बताया जा रहा। दूसरी ओर, भूमि अभिलेख विभाग का दावा है कि कंपनी द्वारा मापन शुल्क न भरने के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। इन विरोधाभासी दावों के बीच जिम्मेदारी टालने का खेल जारी है।
■ मापन हुआ, न कब्जा मिला न मुआवजा
बांबेझरी क्षेत्र के सर्वे क्रमांक 44 से 48 तक जमीन का मापन तो किया गया, लेकिन किसानों को न तो जमीन का वास्तविक कब्जा मिला और न ही मुआवजा। नई खदान के लिए जमीन लेने के आरोप भी हैं, जबकि भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया अधूरी बताई जा रही है। इससे 19 परिवारों का जीवन अनिश्चितता में फंसा हुआ है।
■ निराशा की चरम सीमा : आत्महत्या का प्रयास
15 वर्षों तक सरकारी चौखट पर भटकने के बाद भी न्याय न मिलने से आदिवासी किसान गहरे निराश हो गए। आखिरकार इसी हताशा ने उन्हें आत्महत्या का प्रयास करने पर मजबूर कर दिया—जो व्यवस्था की विफलता को उजागर करता है।
■ समाधान के लिए शासन सकारात्मक: पालकमंत्री का दावा
बांबेझरी और कुसुंबी के किसानों के जमीन विवाद पर सरकार और प्रशासन संवेदनशील है तथा समाधान निकालने के लिए सकारात्मक प्रयास किए जा रहे हैं। यह दावा जिले के पालकमंत्री डॉ. अशोक उइके ने किया।
■ अस्पताल पहुंचकर जाना हाल, दिया भरोसा
विषप्राशन करने वाले किसानों से पालकमंत्री ने जिला सामान्य अस्पताल में मुलाकात कर उनका हाल जाना। उन्होंने आश्वासन दिया कि सरकार किसी को भी असहाय नहीं छोड़ेगी और किसानों के साथ मजबूती से खड़ी है।
■ जनप्रतिनिधि व अधिकारी रहे मौजूद
इस दौरान विधायक किशोर जोरगेवार, जिलाधिकारी वसुमना पंत, मुख्य कार्यकारी अधिकारी पुलकित सिंह, मनपा आयुक्त अकुरी नरेश, डीन डॉ. मिलिंद कांबले, जिला शल्य चिकित्सक डॉ. महादेव चिंचोळे और पुलिस अधीक्षक मुम्मका सुदर्शन सहित अन्य अधिकारी उपस्थित थे।
■ 8 दिनों में बैठक का आश्वासन
पालकमंत्री ने घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि इसका समाधान निकाला जाएगा। उन्होंने बताया कि अगले आठ दिनों में जिलाधिकारी जिवती पहुंचकर किसानों के साथ सकारात्मक चर्चा करेंगी।
■ कंपनी को 2031 तक खनन की अनुमति
प्रशासन के अनुसार, अल्ट्राटेक सीमेंट कंपनी को कुसुंबी क्षेत्र में 643.62 हेक्टेयर में चूना पत्थर खनन की अनुमति 2031 तक दी गई है। इसमें से 63.62 हेक्टेयर निजी जमीन के लिए 24 आदिवासी किसानों को मुआवजा दिया जा चुका है और उनके मामले लंबित नहीं हैं।
■ बांबेझरी जमीन पर खनन से इनकार, वन क्षेत्र का दावा
भूमि अभिलेख विभाग ने सर्वे नंबर 43 से 48 तक कंपनी द्वारा खनन से इनकार किया है, जबकि वन विभाग ने इस क्षेत्र को आरक्षित वन भूमि बताते हुए इसे खेती योग्य नहीं माना है।
■ मामला कोर्ट और मानवाधिकार आयोग में लंबित
प्रशासन के अनुसार, इस मामले में कई बैठकों के बाद भी समाधान नहीं निकला और फिलहाल यह चंद्रपुर सिविल कोर्ट व राज्य मानवाधिकार आयोग के समक्ष विचाराधीन है।
■ कानूनी दायरे में समाधान का भरोसा
प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि न्यायालय में मामला लंबित होने के कारण सीमाएं हैं, फिर भी किसानों को न्याय दिलाने के लिए हरसंभव प्रयास किए जाएंगे और अदालत के निर्णय का प्रभावी क्रियान्वयन किया जाएगा।










