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लॉयड और एसीसी पर मेहरबान सरकार को सिर्फ कोल वॉशरीज में ही दिखा प्रदूषण !

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■ योजनाएं तो बनते-बिगड़ते रहेंगे, मंत्री पंकजा मुंडे से चंद्रपुर को क्या मिला लाभ ?

चंद्रपुर.
चंद्रपुर में प्रदूषण का संकट कोई नया नहीं है। वर्षों से उद्योगों के नाम पर हवा, पानी और जमीन को जहरीला बनाया जा रहा है, लेकिन जब भी सरकार हरकत में आती है, तो कार्रवाई का दायरा सीमित कर दिया जाता है। इस बार भी पर्यावरण मंत्री पंकजा मुंडे का दौरा कुछ ऐसा ही संदेश देकर गया – जहां पूरे जिले में फैले प्रदूषण के असली गुनहगारों पर चुप्पी दिखाई दी, वहीं सिर्फ कोल वॉशरीज पर सख्ती का दिखावा नजर आया। जनता बरसों से लॉयड, एसीसी, अल्ट्राटेक, सीएसटीपीएस जैसे तमाम भारी उद्योगों के प्रदूषण से परेशान हैं। पड़ोस के गड़चिरोली जिले के सूरजागढ़ इलाके से भी बेतहाशा प्रदूषण की खबरें, वीडियो समय-समय पर जनता के समक्ष आ रही है। परंतु मंत्री मुंडे ने बड़े उद्योगों के प्रदूषण पर एक शब्द भी कठोरतापूर्वक उल्लेख नहीं किया। यह हैरत की बात है। 

■ निशाने से बाहर बड़े उद्योग, आसान टारगेट पर कार्रवाई
मंत्री के निरीक्षण में दुर्गापुर का कन्वेयर बेल्ट, बेलसणी और घुग्घुस के पड़ोस की अनेक कोल वॉशरीज शामिल रहीं, लेकिन सवाल उठता है कि चंद्रपुर के सबसे बड़े प्रदूषण स्रोत – लॉयड और एसीसी जैसे उद्योग – इस जांच के दायरे से बाहर क्यों रहे ? क्या सरकार के लिए छोटे और मध्यम उद्योगों पर कार्रवाई करना आसान है, जबकि बड़े कॉर्पोरेट घरानों के सामने सख्ती दिखाना मुश्किल ?

■ सरकार की मंशा पर सवाल
पहले भी प्रस्तुत आंकड़ों में यह स्पष्ट हो चुका है कि जिले में प्रदूषण का बड़ा हिस्सा भारी उद्योगों और तापीय विद्युत परियोजनाओं से आता है। इसके बावजूद निरीक्षण का फोकस सीमित रखना सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करता है।

■ योजनाओं का जाल, जमीन पर शून्य परिणाम
पंकजा मुंडे ने एक वर्ष, तीन वर्ष और दीर्घकालीन योजना बनाने की बात कही है। लेकिन चंद्रपुर की जनता यह सवाल पूछ रही है कि क्या ये योजनाएं भी पहले की तरह फाइलों में ही दम तोड़ देंगी ?
चंद्रपुर में पहले भी कई “एक्शन प्लान” बनाए गए – चाहे वह प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की पहल हो या प्रशासनिक घोषणाएं लेकिन हकीकत यह है कि न हवा साफ हुई, न पानी। आज भी शहर का AQI खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है, और ग्रामीण इलाकों में खेती तक प्रभावित हो रही है।

■ स्वास्थ्य और खेती पर मार, फिर भी जिम्मेदारी तय नहीं
मंत्री ने खुद स्वीकार किया कि प्रदूषण के कारण लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ा है और किसानों का कपास काला पड़ रहा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है ?

■ कितनों पर हुई ठोस कार्रवाई ? शून्य ?
अगर कंपनियों के कारण नुकसान हो रहा है, तो अब तक कितनी कंपनियों पर ठोस कार्रवाई हुई ? कितनों से वसूली की गई ? और कितनों के लाइसेंस रद्द किए गए ?
सिर्फ “फॉगर” और “फॉगिंग मशीन” लगाने की सलाह देना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है, बल्कि यह एक सतही उपाय भर है।

■ राजनीतिक बयानबाजी बनाम ठोस कार्रवाई
विधायक सुधीर मुनगंटीवार ने भी जिला स्तरीय समिति बनाने और कानून के दायरे में निर्णय लेने की बात कही। लेकिन चंद्रपुर की जनता यह अच्छी तरह जानती है कि समितियां बनाना और रिपोर्ट तैयार करना आसान है, असली चुनौती है उन रिपोर्टों पर कार्रवाई करना।
विधानसभा में सवाल उठाने से लेकर जमीनी निरीक्षण तक, पूरी प्रक्रिया में राजनीतिक सक्रियता तो दिखती है, लेकिन परिणाम अब तक शून्य ही रहे हैं। हालांकि यह भी सच है कि विधायक मुनगंटीवार के प्रयास काबिले तारीफ हैं। उनके सतत प्रयासों के चलते ही मंत्री महोदया को यहां आकर निरीक्षण करने के लिए मजबूर होना पड़ा। विधानसभा में भी मुनगंटीवार ने अनेक बार चंद्रपुर के प्रदूषण के मुद्दे को लेकर अपने ही सरकार को नहीं बख्शा। 

दिखावा ज्यादा, समाधान कम
पंकजा मुंडे का यह दौरा उम्मीद जगाने के बजाय कई नए सवाल खड़े कर गया है।
क्या सरकार वास्तव में चंद्रपुर को प्रदूषण मुक्त करना चाहती है, या फिर यह सिर्फ एक और “औपचारिक निरीक्षण” था ?
जब तक बड़े उद्योगों पर समान रूप से सख्ती नहीं होती, जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होती और योजनाओं को जमीन पर लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखती – तब तक चंद्रपुर के लिए “प्रदूषण मुक्त” होने का सपना सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहेगा।

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