कांग्रेस का गढ़ रह चुके वरोरा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र को भेदने में स्वर्गीय बालू धानोरकर कामयाब रहे थे। उन दिनों वे शिवसैनिक हुआ करते थे। उनके विधायक रहते जब उन्होंने कांग्रेस में प्रवेश किया और लोकसभा का चुनाव लड़ा तो भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय गृहराज्य मंत्री हंसराज अहिर को मात दे दी। महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि समूचे देश में कांग्रेस के दिग्गज नेता के रूप में उन्होंने अपनी पहचान बनाई। पूर्व सांसद स्वर्गीय बालू धानोरकर के निधन के बाद जब बीते लोकसभा चुनाव में प्रतिभा धानोरकर ने कांग्रेस की सीट पर चुनाव लड़ा तो जिले के पालकमंंत्री सुधीर मुनगंटीवार को ढाई लाख से अधिक के वोट से पराजीत कर दिया। इस करारी हार के बाद प्रतिभा धानोरकर का कांग्रेस में कद बढ़ गया। इस बार के विधानसभा चुनावों के लिए उन्होंने अपने भाई प्रवीण काकडे के लिए वरोरा से कांग्रेस की टिकट दिलाया है। जबकि भाजपा की ओर से काकडे के खिलाफ पूर्व मंत्री स्व. संजय देवतले के पुत्र करण देवतले को टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारा गया है। वहीं वंचित बहुजन आघाड़ी के टिकट पर स्व. बालू धानोरकर के बड़े भाई अनिल धानोरकर इस चुनावी संघर्ष में कूद पड़े हैं। उन्होंने कांग्रेस से टिकट पाने का प्रयास किया था, परंतु वे इस प्रयास में सफल नहीं हो पाएं। मशहूर नेत्र चिकित्सक एवं समाजसेवा डॉ. चेतन खुटेमाटे तथा शिवसेना से बगावत कर मुकेश जिवतोडे भी वरोरा के लिए अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। भाजपा से बगावत कर अहेतेशाम अली ने प्रहार जनशक्ति पार्टी की ओर से चुनावी मैदान में लड़ रहे है। इन तमाम नेताओं के चलते वरोरा का चुनावी संघर्ष घमासान होने लगा है। कांग्रेस व भाजपा, दोनों पर अनिश्चितता के बादल छाये हुए है।
वरोरा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र पर कांग्रेस नेता व सांसद प्रतिभा धानोरकर का दबदबा है। इसलिए उनके भाई प्रवीण काकडे को मिली कांग्रेस की सीट पर उन्हें जीताकर लाना अब सांसद धानोरकर की न केवल जिम्मेदारी है, बल्कि यह प्रतिष्ठा का भी मुद्दा बन गया है। वहीं पूर्व सांसद स्व. बालू धानोकर के बड़े भाई अनिल धानोरकर बीते अनेक वर्षों से राजनीति में सक्रिय है। वे नगराध्यक्ष भी रह चुके हैं। कांग्रेस को अब घर के ही सदस्य से ही चुनौतियां मिलने के कारण यहां राजनीतिक रस्साकशी का माहौल बन गया है। भाजपा से बगावत कर शुरू में वरिष्ठ नेता रमेश राजुरकर ने नामांकन पर्चा भरा था। परंतु नामांकन वापसी के अंतिम दिन उन्होंने अपना नाम वापिस लेकर भाजपा की राह आसान कर दी। परंतु इस राह में और भी मुश्किलें इसलिए बनी हुई है क्योंकि भाजपा द्वारा करण देवतले को टिकट दिये जाने से नाराज और मुस्लिम समूदाय में गहरी पैठ रखने वाले अहेतेशाम अली की पकड़ आज भी भाजपा के कार्यकर्ताओं पर नजर आती है।
वरोरा का चुनावी रण काफी दिलचस्प होता जा रहा है। यह चुनावी संघर्ष बहुरंगी नजर आ रहा है। डॉ. चेतन खुटेमाटे एक ओबीसी का जाना-माना चेहरा है। उनके सामाजिक कार्यों की बदौलत वे ओबीसी वोटों में सेंध लगा सकते हैं।
बीते चुनावों के इतिहास पर यदि गौर किया जाएं तो यह स्पष्ट होता है कि वरोरा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र कभी भी भाजपा के लिए फतह करने योग्य नहीं रहा। एक बार भी भाजपा को वरोरा सीट पर जीत नहीं मिल पाई है। जबकि कांग्रेस को यहां से 10 बार विधायक बनने का मौका मिला है। एक-एक बार जनता दल, निर्दलीय और शिवसेना ने जीत हासिल की है। शुरूआत से लेकर अब तक यहां दादासाहेब देवतले, नीलकंठराव शिंदे , मोरेश्वर टेमुर्डे, संजय देवतले, बालू धानोरकर, प्रतिभा धानोरकर विधायक बने हैं।
कौन-कौन हैं चुनावी मैदान में ?
प्रवीण सुरेश काकडे (भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस), करण संजय देवतले (भारतीय जनता पार्टी), अनिल नारायण धानोरकर (वंचित बहुजन आघाडी), डॉ. चेतन गजानन खुटेमाटे (निर्दलीय), अहेतेशाम सदाकत अली (प्रहार जनशक्ति), मुकेश मनोज जिवतोडे (निर्दलीय), सागर अनिल वरघणे (बहुजन समाज पक्ष), प्रा. डॉ. जयवंत नथुजी काकडे (बहुजन रिपब्लिकन सोशालिस्ट पार्टी), सेवकदास कवडूजी बरके (पीपल्स पार्टी ऑफ इंडिया (डेमोक्रेटिक), अतुल ईश्वर वानकर (निर्दलीय), तारा महादेवराव काले (निर्दलीय), प्रवीण मनोहर खैरे (निर्दलीय), मुनेश्वर बापूराव बदखल (निर्दलीय), राजू मारोती गायकवाड (निर्दलीय), विनोद कवडूजी खोब्रागडे (निर्दलीय), श्रीकृष्ण धुमदेव दडमल (निर्दलीय), सुभाष जगन्नाथ ठेंगणे (निर्दलीय)।










