Home चंद्रपूर गरीबों पर कार्रवाई, रसूखदारों पर मेहरबानी

गरीबों पर कार्रवाई, रसूखदारों पर मेहरबानी

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■ मनपा कार्यालय से सटकर ही चल रहा अवैध निर्माण कार्य
■ पुरातत्व मंदिर के 100 मीटर दायरे में हो रहे निर्माण पर प्रशासन नींद में
■ मनपा आयुक्त एवं पुरातत्व विभाग की लापरवाह कार्यप्रणाली उजागर

चंद्रपुर।
जिस महानगरपालिका पर शहर में अवैध निर्माणों को रोकने की जिम्मेदारी है, उसी महानगरपालिका के कार्यालय के ठीक नजदीक खुलेआम अवैध निर्माण कार्य चल रहा हो और प्रशासन आंखें मूंदकर बैठा रहे, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि व्यवस्था की विफलता का गंभीर उदाहरण माना जाएगा। चंद्रपुर महानगरपालिका के सहायक आयुक्त कार्यालय से मात्र 25 मीटर की दूरी पर जामा मस्जिद के समीप चल रहे निर्माण कार्य को लेकर अब प्रशासन की कार्यशैली सवालों के घेरे में आ गई है।
कांग्रेस के पूर्व शहर जिला अध्यक्ष रितेश (रामू) तिवारी ने आरोप लगाया है कि निर्माण कार्य कई दिनों से जारी है, लेकिन महानगरपालिका के अधिकारियों ने इसे रोकने अथवा इसकी वैधता की जांच करने की कोई गंभीर पहल नहीं की। मनपा आयुक्त अकुनूरी नरेश एवं पुरातत्व विभाग घोर लापरवाही बरत रहे हैं। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब मनपा अपने ही कार्यालय के आसपास हो रहे निर्माण पर नजर नहीं रख पा रही है, तो पूरे शहर में अवैध निर्माणों पर नियंत्रण का उसका दावा कितना विश्वसनीय है।

🔴 गरीबों पर कार्रवाई, रसूखदारों पर मेहरबानी ?
तिवारी ने आरोप लगाया कि यदि कोई गरीब व्यक्ति छोटा-मोटा निर्माण कर ले तो महानगरपालिका तत्काल नोटिस जारी कर बुलडोजर चलाने में देर नहीं करती। लेकिन जब मामला प्रभावशाली लोगों से जुड़ा दिखाई देता है, तब नियम-कानून और कार्रवाई दोनों फाइलों में कैद हो जाते हैं।
यह दोहरा रवैया न केवल प्रशासन की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि नागरिकों के मन में यह धारणा भी मजबूत करता है कि नियम केवल कमजोर लोगों के लिए हैं, जबकि प्रभावशाली लोगों को संरक्षण प्राप्त है।

📢 पुरातत्व संरक्षण नियमों की भी उड़ रही धज्जियां
स्थानीय नागरिकों के अनुसार संबंधित क्षेत्र में स्थित प्राचीन धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व का पुरातन मंदिर है। आसपास निर्माण गतिविधियों को लेकर विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल तथा अवशेष अधिनियम, 1958 के तहत संरक्षित स्मारकों के 100 मीटर क्षेत्र को निषिद्ध (Prohibited Area) तथा उसके बाद के 200 मीटर क्षेत्र को विनियमित (Regulated Area) माना जाता है।
ऐसे क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के निर्माण, खुदाई अथवा संरचनात्मक बदलाव के लिए सक्षम पुरातत्व प्राधिकरण की अनुमति आवश्यक होती है। यदि संबंधित निर्माण किसी संरक्षित पुरातात्विक या धार्मिक धरोहर के प्रतिबंधित अथवा विनियमित क्षेत्र में किया जा रहा है, तो इसकी जांच करना पुरातत्व विभाग की कानूनी जिम्मेदारी है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इस निर्माण के लिए आवश्यक अनुमति प्राप्त की गई है? यदि अनुमति नहीं ली गई, तो पुरातत्व विभाग अब तक मौन क्यों है? और यदि अनुमति दी गई है, तो उसकी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही?

🔥 मनपा कानून क्या कहते हैं ?
महाराष्ट्र महानगरपालिका अधिनियम तथा भवन निर्माण नियमों के अनुसार किसी भी निर्माण कार्य के लिए स्वीकृत नक्शा, निर्माण अनुमति तथा अन्य आवश्यक दस्तावेज अनिवार्य होते हैं। बिना अनुमति किए गए निर्माण को अवैध माना जाता है और महानगरपालिका को ऐसे निर्माणों पर नोटिस जारी कर उन्हें रोकने अथवा हटाने का अधिकार प्राप्त है।
यदि निर्माण कार्य वास्तव में बिना स्वीकृति के किया जा रहा है, तो मनपा अधिकारियों की निष्क्रियता स्वयं संदेह को जन्म देती है। आखिर जिस भवन से अधिकारी रोजाना आना-जाना करते हैं, उसके सामने चल रही गतिविधियों पर उनकी नजर कैसे नहीं पड़ रही?

नगरसेवक और अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल
तिवारी ने महाकाली प्रभाग के संबंधित नगरसेवक पर भी इस मामले की अनदेखी करने का आरोप लगाया है। वहीं स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि कुछ अधिकारियों का संरक्षण मिलने के कारण निर्माण कार्य निर्बाध रूप से जारी है। यहां तक कि कथित रूप से “चिरीमिरी” यानी रिश्वतखोरी के आरोप भी लगाए जा रहे हैं।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि ऐसी चर्चाएं सार्वजनिक रूप से होने लगी हैं तो यह स्वयं प्रशासन की गिरती विश्वसनीयता का संकेत है।

📢 जवाब दे प्रशासन, कब होगी कार्रवाई ?
शहर में अवैध निर्माणों के खिलाफ चयनात्मक कार्रवाई की शिकायतें पहले भी सामने आती रही हैं। ऐसे में मनपा कार्यालय से सटे क्षेत्र में चल रहे इस निर्माण ने प्रशासन की निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
नागरिकों की मांग है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि निर्माण वैध है या अवैध, क्या आवश्यक अनुमतियां ली गई हैं, और यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदार अधिकारियों तथा निर्माणकर्ताओं के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए।
जब कानून लागू कराने वाली संस्थाओं के दरवाजे पर ही कानून की धज्जियां उड़ती दिखाई दें, तब सवाल केवल एक निर्माण का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता का बन जाता है। चंद्रपुर में आज वही सवाल खड़ा हो गया है।

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