नहीं टूट रही प्रशासन की नींद, ग्रामीणों में गुस्सा
चंद्रपुर.
जिले के गडचांदूर क्षेत्र में स्थित माणिकगढ़ अल्ट्राटेक सिमेंट प्लांट के पास के गांवों थुद्रा, गोपालपुर और गडचांदूर में लगभग 30 से 35 किसानों की खड़ी फसलें पूरी तरह बर्बाद हो चुकी हैं। हालांकि पहले पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण मंडल के हस्तक्षेप से कंपनी पर जमानत राशि जप्त करने की कार्रवाई हुई थी, फिर भी कंपनी पर कोई असर नहीं पड़ा। रात के अंधेरे में लगातार धूल और वायु प्रदूषण होता है। गांव के घरों की छतों और आंगनों में हर समय धूल की परतें जम रही हैं, जिससे लोगों का स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। गांव में किडनी, हार्ट अटैक, शुगर, बीपी जैसी बीमारियाँ आम हो गई हैं, और बच्चे भी बीमारियों से पीड़ित हैं। रबी और खरीफ दोनों मौसमों की फसलें नष्ट हो रही हैं। खेतों में 4 से 8 इंच तक धूल की परतें जम चुकी हैं। इस समस्या को लेकर गोपालपुर के निवासियों ने तहसीलदार, प्रदूषण नियंत्रण मंडल और उपविभागीय अधिकारी से जांच और मौका मुआयना करने की मांग की थी, लेकिन एक महीने के बाद भी कोई जांच नहीं की गई। इससे साफ है कि प्रशासन अनदेखी कर रहा है। गांव में प्रदूषण के खिलाफ गुस्सा बढ़ रहा है। सुरेश आत्राम, अनिल मडावी, मारोती मेश्राम, बिरशाव कोरांगे और वामन कोडापे जैसे लोगों ने तीव्र आंदोलन की चेतावनी दी है। आदिवासी परिवारों पर हो रहा अन्याय और प्रदूषण नियंत्रण मंडल की लापरवाही से खेती और स्वास्थ्य दोनों संकट में हैं। इस संबंध में महाराष्ट्र की पर्यावरण मंत्री पंकजा मुंडे और सचिव को ज्ञापन भेजा गया है, जिसकी जानकारी राष्ट्रवादी कांग्रेस के प्रदेश सह-सचिव आबिद अली ने दी।
1. प्रदूषण से फसलें नष्ट :
माणिकगड के पास स्थित अल्ट्राटेक सिमेंट प्लांट से निकल रही धूल के कारण थुद्रा, गोपालपूर व गडचांदूर क्षेत्र के 30-35 किसानों की फसलें पूरी तरह बर्बाद हो चुकी हैं।
2. मजदूरों का संकट :
खेतों में धूल के कारण मजदूर भी काम करने को तैयार नहीं, जिससे किसानों की परेशानियाँ बढ़ गई हैं।
3. जल संकट :
प्रदूषण की वजह से गोपालपूर की जल आपूर्ति योजना बंद हो गई है, जिससे गांव में पीने के पानी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
4. स्वास्थ्य पर बुरा असर :
धूल के कारण गांव के लोगों को किडनी, हार्ट अटैक, शुगर, बीपी जैसी बीमारियाँ हो रही हैं। बच्चे भी बीमार पड़ रहे हैं।
5. जमीन की उर्वरता घट रही :
खेतों में 4-8 इंच तक धूल की परतें जम चुकी हैं, जिससे न खेती हो रही है, न ही मिट्टी उपजाऊ रह गई है।
6. प्रशासन की उदासीनता :
नागरिकों ने तहसीलदार, उपविभागीय अधिकारी और प्रदूषण नियंत्रण मंडल से जांच की मांग की थी, लेकिन एक महीने बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।
7. गांव में विरोध की चेतावनी :
ग्रामीणों ने सुरेश आत्राम, अनिल मडावी, मारोती मेश्राम, बिरशाव कोरांगे और वामन कोडापे जैसे नेताओं के साथ मिलकर आंदोलन की चेतावनी दी है।
8. सरकार को ज्ञापन भेजा गया :
पर्यावरण मंत्री पंकजा मुंडे और सचिव को ज्ञापन भेजकर पर्यावरणीय अन्याय और आदिवासियों की स्थिति पर ध्यान देने की मांग की गई है।
9. दूसरे जिलों से तुलना :
यवतमाल जिले में कंपनियों ने शेतकऱ्यां को प्रति एकड़ ₹15,000 से ₹54,200 तक का मुआवजा दिया है, लेकिन गडचांदूर क्षेत्र में कोई सहायता नहीं मिली।
10. आदिवासी समाज में असंतोष :
खुलेआम हो रहे शोषण व प्रशासन की चुप्पी के कारण आदिवासी किसान नाराज़ हैं और अब न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में हैं।










