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चंद्रपुर मनपा : समाज कल्याण का बंटाधार, अमीरों के जोन-1 में सचिन माकोड़े की अधिक रुचि

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■ मनपा का समाज कल्याण विभाग ‘वेंटिलेटर’ पर !
■ पूर्णकालिक अधिकारी के अभाव में अधिकांश कार्य ठप

चंद्रपुर।
चंद्रपुर शहर महानगरपालिका का समाज कल्याण विभाग आज गंभीर प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार दिखाई पड़ रहा है। विडंबना यह है कि जिस विभाग के कंधों पर शहर के दिव्यांगों, महिलाओं, गरीबों, झुग्गीवासियों और समाज के सबसे कमजोर तबकों के कल्याण की जिम्मेदारी है, वही विभाग इन दिनों पूर्णकालिक नेतृत्व के अभाव में लगभग ‘वेंटिलेटर’ पर पहुंच गया है। नागरिकों का आरोप है कि विभाग की अनेक योजनाएं, प्रस्ताव और लाभार्थियों से जुड़े मामले महीनों से लंबित पड़े हैं, जबकि प्रशासन इस स्थिति पर मौन साधे हुए है। और इस विभाग के मुखिया सचिन माकोडे का अमीरों के जोन क्रमांक 1 में करोड़ों की संपत्तियों की फाइलों में अधिक रुचि लेते नजर आते हैं।

■ जिम्मेदारी समाज कल्याण की, प्राथमिकता अमीरों का जोन!
समाज कल्याण अधिकारी के रूप में कार्यरत सचिन माकोड़े के पास वर्तमान में जोन क्रमांक-1 के सहायक आयुक्त का अतिरिक्त प्रभार भी है। यही अतिरिक्त जिम्मेदारी अब पूरे विवाद का केंद्र बनती जा रही है। मनपा के गलियारों में चर्चा है कि माकोड़े की सक्रियता और रुचि समाज कल्याण विभाग से कहीं अधिक सिविल लाइंस क्षेत्र स्थित जोन-1 के प्रशासनिक कामकाज में दिखाई देती है। परिणामस्वरूप गरीबों और वंचितों से जुड़ी योजनाएं पीछे छूटती जा रही हैं, जबकि करोड़ों रुपये के विकास कार्यों और महंगी जमीन-जायदाद से संबंधित फाइलों वाले क्षेत्र पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।

■ सिविल लाइंस से मोह आखिर क्यों नहीं टूटता?
मनपा के जानकारों के अनुसार सचिन माकोड़े लंबे समय तक जोन-1 में सहायक आयुक्त के रूप में कार्यरत रहे हैं। यह वही क्षेत्र है जिसे शहर का सबसे समृद्ध और प्रभावशाली इलाका माना जाता है। यहां करोड़ों रुपये के निर्माण कार्य, व्यावसायिक गतिविधियां तथा महंगी संपत्तियों से जुड़ी फाइलें नियमित रूप से आती रहती हैं। चर्चा यह भी है कि जब उनका तबादला अन्यत्र हुआ था, तब उन्होंने अपने प्रभाव और संपर्कों के जरिए पुनः इसी क्षेत्र में वापसी करने में सफलता हासिल की। सवाल यह उठता है कि यदि समाज कल्याण विभाग उनकी मूल जिम्मेदारी है, तो फिर उनकी प्रशासनिक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा लगातार जोन-1 में ही क्यों खर्च हो रहा है?

■ शिकायतों के बावजूद नहीं बदली व्यवस्था
सूत्रों के अनुसार माकोड़े के कार्यप्रणाली को लेकर समय-समय पर विभिन्न स्तरों पर शिकायतें भी हुई हैं। इसके बावजूद न तो अतिरिक्त प्रभार वापस लिया गया और न ही समाज कल्याण विभाग को स्वतंत्र रूप से संचालित करने के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था बनाई गई। इससे यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि प्रभावशाली लोगों और रसूखदार क्षेत्रों से जुड़े मामलों को प्राथमिकता मिल रही है, जबकि समाज के कमजोर वर्गों के प्रश्न प्रशासनिक प्राथमिकताओं में नीचे खिसकते जा रहे हैं।

■ जिन योजनाओं पर टिका है हजारों गरीबों का भविष्य
समाज कल्याण विभाग केवल एक सामान्य प्रशासनिक शाखा नहीं है। इसी विभाग के माध्यम से दिव्यांगजनों के लिए विभिन्न सहायता योजनाएं संचालित होती हैं। रमाई आवास योजना, शबरी आवास योजना, महिला सशक्तिकरण के लिए स्वयं सहायता समूहों के कार्यक्रम, सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाएं तथा अनेक शासकीय लाभ पात्र हितग्राहियों तक पहुंचाने का दायित्व इसी विभाग पर है। ऐसे में विभाग की कार्यक्षमता प्रभावित होने का सीधा असर उन लोगों पर पड़ता है जिनके पास अपने अधिकारों के लिए लड़ने के संसाधन भी नहीं होते।

■ फाइलों में उलझा कल्याण, लाभार्थी हो रहे परेशान
नागरिकों का कहना है कि विभाग में कई प्रस्तावों की प्रक्रिया धीमी पड़ गई है। अनेक मामलों में लाभार्थियों को समय पर मार्गदर्शन नहीं मिल पा रहा है। यदि विभाग का प्रमुख अधिकारी अपना अधिकांश समय दूसरे प्रशासनिक दायित्वों में व्यतीत करेगा, तो योजनाओं की निगरानी, प्रस्तावों का परीक्षण और लाभार्थियों की समस्याओं का निराकरण प्रभावित होना स्वाभाविक है। यही कारण है कि विभाग की कार्यक्षमता को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।

■ गरीबों के विभाग पर अतिरिक्त बोझ क्यों?
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि समाज कल्याण जैसे संवेदनशील विभाग के अधिकारी पर अतिरिक्त प्रशासनिक बोझ डालने की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ी? क्या महानगरपालिका के पास जोन-1 के लिए अलग अधिकारी नियुक्त करने की क्षमता नहीं है? या फिर प्रशासनिक सुविधा के नाम पर समाज कल्याण विभाग को जानबूझकर द्वितीय श्रेणी की प्राथमिकता दी जा रही है? नागरिकों का मानना है कि यह व्यवस्था अंततः गरीबों, महिलाओं और दिव्यांगों के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है।

■ अब नागरिकों की मांग : समाज कल्याण को मिले पूर्णकालिक नेतृत्व
बढ़ती नाराजगी के बीच नागरिकों ने मांग की है कि समाज कल्याण विभाग को तत्काल पूर्णकालिक अधिकारी उपलब्ध कराया जाए तथा जोन क्रमांक-1 के लिए अलग सहायक आयुक्त की नियुक्ति की जाए। उनका कहना है कि जब तक समाज कल्याण विभाग को पूर्णकालिक नेतृत्व नहीं मिलेगा, तब तक गरीबों और वंचितों के लिए बनाई गई योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन संभव नहीं है। अब निगाहें महानगरपालिका प्रशासन पर टिकी हैं कि वह समाज कल्याण विभाग को ‘वेंटिलेटर’ से बाहर निकालने के लिए ठोस कदम उठाता है या फिर यह विभाग यूं ही उपेक्षा का शिकार बना रहेगा।

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