■ इलेक्शन ऑब्जर्वर, ED, CBI, CID, आयकर आदि विभागों को कैसे नहीं पता 5, 5 लाख रुपये बंटे ?
■ शैलेश अग्रवाल व विजय वडेट्टीवार के आरोपों से मचा घमासान
चंद्रपुर.
वर्धा-चंद्रपुर-गढ़चिरौली क्षेत्र की विधान परिषद (विप) चुनाव प्रक्रिया अब केवल एक राजनीतिक चुनाव नहीं, बल्कि कथित धनबल, सौदेबाजी और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला बन गई है। कांग्रेस उम्मीदवार शैलेश अग्रवाल द्वारा नामांकन वापस लेने और भाजपा उम्मीदवार अरुण लखानी के निर्विरोध निर्वाचित होने के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में आरोपों का ऐसा विस्फोट हुआ है, जिसने चुनावी व्यवस्था की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि चुनाव के दौरान वास्तव में करोड़ों रुपये का लेन-देन हुआ, नगरसेवकों को लाखों रुपये बांटे गए, उन्हें पर्यटन स्थलों पर भेजा गया और राजनीतिक निष्ठा खरीदने का खेल चला, तो फिर चुनाव आयोग के प्रेक्षक (ऑब्जर्वर), आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय (ED), सीबीआई, सीआईडी तथा अन्य जांच एजेंसियों को इसकी भनक तक कैसे नहीं लगी ? क्या अब भी कोई जांच एजेंसी इस मामले की जांच कर पाएगी ? यह सबसे बड़ा सवाल है। वहीं दूसरी ओर स्वयं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विजय वडेट्टीवार लगातार इस मामले में मुखर होकर बयान दे रहे हैं। जबकि चंद्रपुर कांग्रेस के जिलाध्यक्ष सुभाष धोटे एवं स्थानीय सांसद प्रतिभा धानोरकर इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं। इसके चलते कांग्रेस के भीतर की राजनीति में चर्चाओं का बाजार गर्म हो चला है।
■ शैलेश अग्रवाल के आरोपों ने बढ़ाई सियासी गर्मी
कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार रहे शैलेश अग्रवाल ने नामांकन वापस लेने के बाद गंभीर आरोप लगाए कि उनकी ही पार्टी के कुछ नेताओं ने भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में काम किया। अग्रवाल का दावा है कि कांग्रेस के नगरसेवकों को आर्थिक प्रलोभन दिए गए, जिसके कारण उन्हें अपनी ही पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधियों का समर्थन नहीं मिला।
अग्रवाल के अनुसार, जब वे चुनाव प्रचार के दौरान नगरसेवकों से मिलने उनके घर पहुंचे तो अधिकांश नगरसेवक उपलब्ध ही नहीं थे। कई परिवारों ने बताया कि वे बाहर गए हुए हैं। इसके बाद उन्हें यह एहसास हुआ कि चुनावी मुकाबला राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक ताकत का खेल बन चुका है।
उन्होंने आरोप लगाया कि लोकतंत्र की जगह पैसों ने ले ली है और जनप्रतिनिधियों की निष्ठा खुलेआम खरीदी-बेची जा रही है। ऐसी परिस्थितियों में चुनाव लड़ना उन्होंने उचित नहीं समझा और नामांकन वापस ले लिया।
■ 5-5 लाख रुपये देने के आरोप, फिर भी कोई जांच नहीं ?
राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा उन आरोपों की है जिनमें कहा जा रहा है कि कुछ नगरसेवकों को पांच लाख रुपये नकद तथा मतदान के बाद पांच लाख रुपये अतिरिक्त देने का आश्वासन दिया गया। आरोप यह भी हैं कि कई नगरसेवकों को गोवा भेजा गया और बाद में उन्हें जयपुर स्थानांतरित करने की तैयारी थी।
यदि इन आरोपों में जरा भी सच्चाई है तो यह राशि लाखों नहीं बल्कि करोड़ों रुपये तक पहुंच सकती है। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि इतनी बड़ी कथित वित्तीय गतिविधि चुनावी निगरानी तंत्र की नजरों से कैसे बच गई?
चुनावी प्रक्रिया के दौरान धनबल रोकने के लिए अनेक एजेंसियां सक्रिय रहती हैं। आयकर विभाग नकदी की निगरानी करता है, चुनाव आयोग विशेष प्रेक्षक नियुक्त करता है, जबकि अन्य जांच एजेंसियां भी संवेदनशील मामलों पर नजर रखती हैं। इसके बावजूद इतने गंभीर आरोप सामने आने के बाद अब तक किसी बड़े स्तर की जांच प्रारंभ नहीं होने से राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं।
■ विजय वडेट्टीवार ने भी लगाए गंभीर आरोप
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विजय वडेट्टीवार ने भी सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि चुनाव के दौरान धनबल का खुलकर उपयोग किया गया और कांग्रेस के नगरसेवकों को प्रभावित करने का प्रयास हुआ। वडेट्टीवार के आरोपों ने इस पूरे विवाद को और अधिक गंभीर बना दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब एक ओर कांग्रेस का अधिकृत उम्मीदवार और दूसरी ओर पार्टी का वरिष्ठ नेता एक जैसी आशंकाएं व्यक्त कर रहे हों, तब इन आरोपों की निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है।
■ सिर्फ अग्रवाल पर कार्रवाई, बाकी पर चुप्पी क्यों ?
नामांकन वापस लेने के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने शैलेश अग्रवाल को पार्टी से निष्कासित कर दिया। लेकिन अब कांग्रेस के भीतर ही सवाल उठ रहे हैं कि यदि अग्रवाल के आरोप गलत हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच क्यों नहीं कराई जा रही? और यदि आरोपों में तथ्य हैं, तो फिर कथित रूप से पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल नेताओं, पदाधिकारियों और नगरसेवकों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
कई कार्यकर्ताओं का कहना है कि अग्रवाल पर कार्रवाई आसान है, लेकिन उन लोगों की पहचान करना कठिन साबित हो रहा है जिन पर राजनीतिक सौदेबाजी के आरोप लग रहे हैं।
■ लोकतंत्र पर सबसे बड़ा सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं की चुनाव प्रक्रिया धनबल के प्रभाव से मुक्त रह गई है? यदि निर्वाचित प्रतिनिधियों की राजनीतिक निष्ठा आर्थिक प्रलोभनों से प्रभावित हो सकती है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर इसका सीधा असर पड़ता है।
वर्धा-चंद्रपुर-गढ़चिरौली विधान परिषद चुनाव का परिणाम भले ही घोषित हो चुका हो, लेकिन चुनाव से जुड़े आरोपों ने कई अनुत्तरित प्रश्न छोड़ दिए हैं। अब जनता की नजर इस बात पर टिकी है कि चुनाव आयोग और संबंधित जांच एजेंसियां इन गंभीर आरोपों पर संज्ञान लेकर कोई कार्रवाई करती हैं या फिर यह मामला भी राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रह जाएगा।










