■ मजदूर सहकारी संस्थाओं के माध्यम से करोड़ों का घोटाला
■ मजदूरों के नाम पर नेताओं का साम्राज्य, प्रशासन मूकदर्शक
चंद्रपुर.
जिन मजदूर सहकारी संस्थाओं का गठन वास्तविक श्रमिकों के आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लिए किया गया था, वे आज कथित रूप से राजनीतिक नेताओं और प्रभावशाली लोगों की कमाई का माध्यम बन गई हैं। जिन संस्थाओं में सदस्य और संचालक बनने के लिए शारीरिक श्रम करना अनिवार्य है, वहां करोड़ों की संपत्ति वाले नेता, ठेकेदार और राजनीतिक पदाधिकारी खुद को “मजदूर” बताकर संस्थाओं पर कब्जा जमाए बैठे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो लोग महंगी कारों में घूमते हैं, आलीशान बंगलों में रहते हैं, जनप्रतिनिधियों के साथ देखे जाते हैं, चुनावी शपथपत्रों में करोड़ों रुपये की संपत्ति घोषित करते हैं, और वीआईपी जीवन जीते हैं, वे आखिर किस आधार पर मजदूर घोषित किए गए?
■ नियम कुछ और, जमीन पर हकीकत बिल्कुल उलट
सहकार आयुक्त, सहकार विभाग द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार मजदूर सहकारी संस्था का सदस्य वही व्यक्ति बन सकता है –
➤ जो स्वयं शारीरिक श्रम करता हो।
➤ जिसकी आजीविका मजदूरी पर निर्भर हो।
➤ जो अल्प या अत्यल्प भूधारक हो।
➤ जो आयकरदाता न हो।
➤ जिसने कम से कम 90 दिन मजदूर के रूप में कार्य किया हो।
➤ जिसने स्वयं को मजदूर घोषित करने वाला शपथपत्र प्रस्तुत किया हो।
लेकिन देखने में आ रहा है कि इन सभी शर्तों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई गईं और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त लोगों को मजदूर बताकर संस्थाओं का पंजीकरण कर दिया गया।
■ 50 लाख तक के सरकारी ठेकों ने पैदा किया ‘फर्जी मजदूरों’ का उद्योग
मजदूर सहकारी संस्थाओं को 50 लाख रुपये तक के सरकारी कार्य सीधे आवंटित किए जा सकते हैं। यही व्यवस्था अब विवादों के केंद्र में है। चर्चा है कि इसी प्रावधान का दुरुपयोग करते हुए अनेक राजनीतिक नेताओं ने खुद को मजदूर दिखाकर संस्थाएं बनाईं और सरकारी ठेकों पर कब्जा जमा लिया। परिणामस्वरूप वास्तविक श्रमिकों के हित पीछे छूट गए और संस्थाएं सरकारी ठेकों के वितरण का माध्यम बनकर रह गईं।
■ करोड़पति नेता 90 दिन मजदूरी कैसे कर सकते हैं ?
पूरा मामला कई गंभीर सवाल खड़ा करता है –
➤ करोड़ों की संपत्ति रखने वाले लोग 90 दिन तक मजदूरी करने का प्रमाण कैसे दे सकते हैं ?
➤ अधिकारियों ने मजदूरी संबंधी शपथपत्रों की जांच किए बिना उन्हें स्वीकार कैसे कर लिया ?
➤ मजदूर होने के प्रमाणपत्र किस आधार पर जारी किए गए ?
➤ यदि प्रमाणपत्र गलत हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई ?
इन सवालों का जवाब आज तक किसी विभाग ने स्पष्ट रूप से नहीं दिया है।
■ प्रमाणपत्र किसने दिए ? विभाग एक-दूसरे पर डाल रहे जिम्मेदारी
जब इस विषय पर सहकार क्षेत्र के जानकारों से पूछा गया कि कथित करोड़पति नेताओं को मजदूर होने के प्रमाणपत्र कैसे मिले, तो जिम्मेदारी लेबर ऑफिसर और राजस्व विभाग की होने की जानकारी दी गई।
दूसरी ओर संबंधित विभागों की ओर से इस प्रकरण में अब तक कोई जांच अथवा ठोस कार्रवाई नहीं की। इससे पूरे तंत्र की जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न लग रहा है।
■ चंद्रपुर में फर्जी मजदूर संस्थाओं को संरक्षण का आरोप
चंद्रपुर जिले में लंबे समय से यह आरोप लगाया जाता रहा है कि अनेक मजदूर सेवा सहकारी संस्थाएं फर्जी मजदूरों के आधार पर पंजीकृत की गई हैं। आरोप यह भी है कि तहसीलदार, तालुका सहायक निबंधक और जिला उपनिबंधक स्तर तक के अधिकारियों के संरक्षण में यह व्यवस्था फल-फूल रही है।
हर बार कार्रवाई के दावे किए जाते हैं, लेकिन किसी संस्था पर ठोस कार्रवाई होते दिखाई नहीं देती। इससे पूरे प्रशासनिक ढांचे की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।
■ कानून में कार्रवाई का प्रावधान, लेकिन अमल नदारद
महाराष्ट्र सहकारी संस्था अधिनियम 1960 के तहत यदि किसी सहकारी संस्था में अनियमितता, आर्थिक गड़बड़ी, नियमों का उल्लंघन या अकार्यकुशलता पाई जाती है, तो –
➤ संस्था का विशेष लेखा परीक्षण (स्पेशल ऑडिट) कराया जा सकता है।
➤ संस्था की मान्यता रद्द की जा सकती है।
➤ प्रशासक नियुक्त किया जा सकता है।
➤ पासबुक जब्त कर कार्य रोक दिए जा सकते हैं।
➤ दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
इसके बावजूद चंद्रपुर जिले में ऐसी किसी भी प्रभावी कार्रवाई के उदाहरण सामने नहीं आए हैं।
■ फर्जी दस्तावेजों से सरकारी धन की लूट
आलोचकों का कहना है कि मजदूर सहकारी संस्थाओं का मूल उद्देश्य श्रम बेचकर आजीविका अर्जित करना है। लेकिन कई संस्थाएं कथित रूप से फर्जी मजदूर दिखाकर, बनावटी दस्तावेज तैयार कर और नियमों की अनदेखी कर सरकारी धन का दुरुपयोग कर रही हैं।
यदि यह आरोप सही हैं, तो यह केवल सहकार कानून का उल्लंघन नहीं बल्कि सरकारी खजाने के साथ धोखाधड़ी का मामला भी बन सकता है।
■ संयुक्त फेडरेशन पर टेंडर मैनेजमेंट के आरोप
जिले की मजदूर सहकारी संस्थाओं के संयुक्त फेडरेशन के अध्यक्ष और सचिव पर भी गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं।
आरोपों के अनुसार –
➤ करोड़ों रुपये के ठेकों का प्रबंधन मनमाने ढंग से किया जाता है।
➤ कुछ संस्थाओं में निर्धारित संख्या से कम सदस्य हैं।
➤ गैर-सदस्यों से काम कराया जाता है।
➤ आर्थिक अनियमितताओं और गबन की शिकायतें हैं।
➤ विशेष ऑडिट की मांग के बावजूद आदेश नहीं दिए जाते।
यदि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच हो जाए तो पूरे नेटवर्क का खुलासा हो सकता है।
■ तहसील कार्यालयों की भूमिका भी संदेह के घेरे में
मजदूर होने के प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
आलोचकों का कहना है कि जिन लोगों की जीवनशैली किसी बड़े कारोबारी या राजनीतिक नेता जैसी है, उन्हें मजदूर प्रमाणपत्र कैसे मिल गए? क्या स्थानीय स्तर पर राजस्व अधिकारियों, तलाठियों, ग्रामसेवकों और अन्य संबंधित कर्मचारियों ने पर्याप्त जांच की थी या केवल कागजी औपचारिकताएं पूरी की गईं?
■ जिला उपनिबंधक की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
मामले का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि सहकार विभाग के पास कार्रवाई के पर्याप्त अधिकार होने के बावजूद कथित फर्जी मजदूर संस्थाओं पर कोई बड़ी कार्रवाई सामने नहीं आई।
आलोचकों का कहना है कि यदि संस्थाओं के माध्यम से सरकारी कामों का आवंटन होता है, आर्थिक अनियमितताओं की शिकायतें हैं और फर्जी मजदूरों के आधार पर पंजीकरण के आरोप हैं, तो फिर जांच और दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
इसी कारण जिला उपनिबंधक कार्यालय की भूमिका भी संदेह के घेरे में आ गई है।
■ सबसे बड़ा प्रश्न : मजदूरों का हक किसने छीना ?
पूरे विवाद का मूल प्रश्न यही है कि जिन संस्थाओं का गठन वास्तविक मजदूरों के कल्याण और रोजगार के लिए किया गया था, क्या वे राजनीतिक नेताओं और प्रभावशाली लोगों के लिए सरकारी ठेके हासिल करने का माध्यम बन चुकी हैं?
यदि करोड़पति नेता मजदूर बन सकते हैं, यदि फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर संस्थाएं पंजीकृत हो सकती हैं और यदि शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होती, तो यह केवल सहकार व्यवस्था की विफलता नहीं बल्कि वास्तविक मजदूरों के अधिकारों पर सीधा हमला माना जाएगा।
अब आवश्यकता केवल आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि जिले की सभी मजदूर सहकारी संस्थाओं, उनके सदस्यों, प्रमाणपत्रों, ठेकों और वित्तीय लेन-देन की स्वतंत्र एवं उच्चस्तरीय जांच की है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि मजदूरों के नाम पर आखिर किसका कल्याण हो रहा है।










