■ …वरना खत्म हो जाएंगे बाघों के कुनबे
चंद्रपुर।
बाघों का जन्नत कहे जाने वाले ताड़ोबा-अंधारी टाइगर प्रोजेक्ट में देश-विदेश के पर्यटक आते हैं। भले ही अन्य वन्य प्राणियों के दर्शन आम बात हो, लेकिन यहां बाघों का दर्शन कर अमूमन हर पर्यटक खुश होकर लौटता है। लेकिन अब जंगल का राजा कहे जाने वाले इन बाघों को पालतू कुत्तों से डरने की नौबत आन पड़ी है। क्योंकि पड़ोस के मध्य प्रदेश में अचानक से 5 बाघों की मौत हो गई। इस घटना से समूचे देश की बाघ परियोजनाओं में खलबली मची हुई है। और इसका मुख्य कारण है पालतू पशुओं और खासकर पालतू कुत्तों से फैलने वाला रोग। बाघों में कैनाइन डिस्टेंपर नामक वायरस का अटैक होने लगा है। और यह वायरस आमतौर पर पालतू कुत्तों के कारण फैलता है, जो कुत्ते जंगल से सटे इलाकों में जलस्त्रोतों का पानी पीते हैं। कुत्तों की लार से दूषित पानी बाघों को संक्रमित कर जाता है। और बड़ी संख्या में बाघों की मौत का खतरा है। इसलिए चलते देश भर की बाघ परियोजनाओं के लिए अलर्ट जारी कर दिया गया है।
आइए… जानते हैं कि कैनाइन डिस्टेंपर है क्या? और बाघों से उसका क्या है कनेक्शन?
■ कैनाइन डिस्टेंपर क्या है?
कैनाइन डिस्टेंपर (Canine Distemper) एक बेहद संक्रामक वायरल बीमारी है, जो मुख्य रूप से कुत्तों और मांसाहारी वन्यजीवों को प्रभावित करती है। यह बीमारी “कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV)” के कारण होती है, जो Paramyxoviridae परिवार के Morbillivirus समूह का वायरस है। यही समूह खसरा (Measles) जैसी बीमारियों से भी जुड़ा हुआ है।
यह वायरस केवल कुत्तों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि बाघ, शेर, तेंदुआ, लकड़बग्घा, लोमड़ी, भेड़िया और अन्य जंगली मांसाहारी जानवरों में भी फैल सकता है।
■ कैनाइन डिस्टेंपर के प्रमुख लक्षण
संक्रमित जानवरों में यह वायरस शरीर के कई हिस्सों – श्वसन तंत्र, पाचन तंत्र और तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है। शुरुआती लक्षण – तेज बुखार, सुस्ती और कमजोरी, आंख और नाक से पानी या मवाद निकलना, भूख कम होना, खांसी और सांस लेने में परेशानी।
गंभीर लक्षण – उल्टी और दस्त, शरीर का वजन तेजी से घटना, चलने में लड़खड़ाहट, मांसपेशियों में कंपन, दौरे (Seizures), लकवे जैसी स्थिति, असामान्य व्यवहार।
वन्यजीवों में कई बार बीमारी का पता तब चलता है, जब जानवर असामान्य रूप से सुस्त, आक्रामक या भ्रमित दिखाई देने लगते हैं।
■ यह बीमारी कैसे फैलती है?
कैनाइन डिस्टेंपर वायरस मुख्य रूप से संक्रमित जानवरों की लार, नाक के स्राव, आंखों के पानी, मल-मूत्र, या सांस के जरिए फैलता है।
■ संक्रमण फैलने के प्रमुख कारण
जंगल के आसपास आवारा या बिना टीकाकरण वाले कुत्तों की मौजूदगी, संक्रमित कुत्तों का पानी के स्रोतों तक पहुंचना, गांवों से जंगल में मानव और पालतू पशुओं की बढ़ती आवाजाही, संक्रमित जानवरों के संपर्क में आना, कमजोर निगरानी और वन क्षेत्रों में गश्त की कमी।
■ बाघों के लिए यह इतना बड़ा खतरा क्यों है?
बाघों में यह वायरस बेहद खतरनाक साबित हो सकता है क्योंकि:
1. प्रतिरक्षा प्रणाली पर हमला – यह वायरस बाघों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर कर देता है, जिससे अन्य संक्रमण भी तेजी से फैलते हैं।
2. तंत्रिका तंत्र को नुकसान – संक्रमित बाघ शिकार करने, चलने या खुद को सुरक्षित रखने में असमर्थ हो सकते हैं।
3. शावकों में मृत्यु दर अधिक – बाघ के बच्चों (शावकों) में यह संक्रमण तेजी से जानलेवा बनता है।
4. छोटे बाघ समूहों पर बड़ा असर – भारत में बाघों की संख्या सीमित और संरक्षित क्षेत्रों में केंद्रित है। ऐसे में एक ही क्षेत्र में संक्रमण फैलने से कई बाघों की मौत हो सकती है, जिससे पूरी आबादी प्रभावित होती है।
5. विलुप्ति का खतरा बढ़ना – अगर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह वायरस बाघ संरक्षण के लिए गंभीर संकट बन सकता है।
■ यह वायरस जंगल तक कैसे पहुंचता है?
विशेषज्ञों के अनुसार – गांवों के पालतू और आवारा कुत्ते जंगलों के आसपास घूमते हैं। वे पानी के स्रोतों, शिकार स्थलों और जंगल के रास्तों तक पहुंच जाते हैं। बाद में उन्हीं स्थानों पर बाघ या अन्य जंगली जानवर आने से वायरस फैल जाता है। इसी वजह से अब टाइगर रिजर्व के आसपास कुत्तों के बड़े पैमाने पर टीकाकरण पर जोर दिया जा रहा है।
■ बचाव और रोकथाम के उपाय
आवारा और पालतू कुत्तों का नियमित टीकाकरण, जंगल के बफर जोन में निगरानी बढ़ाना, संक्रमित जानवरों को तुरंत अलग करना, वन विभाग और पशुपालन विभाग के संयुक्त अभियान, पानी के स्रोतों और संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी, वनकर्मियों को रोग पहचान और नियंत्रण का प्रशिक्षण।
■ पहले भी सैकड़ों बाघ इस वायरस से मारे गए
2018 में गुजरात के गिर अभयारण्य में इसी वायरस से 27 से अधिक शेरों की मौत हुई थी। पन्ना टाइगर रिजर्व में भी एक बाघिन की मौत इससे जुड़ी बताई गई थी। भारत में बाघ, तेंदुए और शेरों में इस वायरस के संक्रमण के कई मामले सामने आ चुके हैं। इसलिए वैज्ञानिक और वन्यजीव विशेषज्ञ इसे भारत की बाघ संरक्षण व्यवस्था के लिए एक गंभीर जैविक खतरा मान रहे हैं। अभी ताजा मामला मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व क्षेत्र में उजागर हुआ है। यहां ‘कैनाइन डिस्टेंपर’ वायरस के कारण 5 बाघों की मौत हुई है। इसके बाद देश की बाघ संरक्षण व्यवस्था को लेकर देशभर के सभी टाइगर रिजर्व के लिए सतर्कता संबंधी निर्देश जारी किए गए हैं।
■ ताड़ोबा कर रहा टीकाकरण अभियान
ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व में पिछले 2 वर्षों से आसपास के गांवों में पालतू पशुओं के लिए लगातार टीकाकरण अभियान चलाया जा रहा है। वर्तमान में महुआ के फूल और तेंदूपत्ता संग्रह के कारण ग्रामीणों की जंगल में आवाजाही बढ़ी है। वे अपने साथ सुरक्षा के लिए पालतू कुत्ते भी ले जाते हैं। ये कुत्ते पानी के स्रोतों तक पहुंचते हैं और बाद में उसी स्थान पर बाघ या अन्य मांसाहारी जानवर आने से संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है।










