चंद्रपुर :
ताड़ोबा अंधारी व्याघ्र प्रकल्प में मौजूद 3 वर्षीय बाघिन झीनत को सरकार ने स्थलांतरित करते हुए ओडिशा के सिमिलिपाल टाइगर रिजर्व के लिए सौंप दिया। बाघिन तो आखिर बाघिन है। वह कैसे एक जगह, एक जंगल में रह पातीं। अपने नैसर्गिक विचरण के लिए झीनत बाघिन ओडिशा से झारखंड के जंगलों में प्रवेश कर गई। जब रेडियो कॉलर से उसे ट्रैक किया गया तो ओडिशा वन विभाग का सिरदर्द बढ़ गया। आखिरकार उसे झारखंड के जंगलों से खोजकर दोबारा ओडिशा के सिमिलिपाल अभयारण्य में लाने के लिए प्रयास किये जा रहे है। ताड़ोबा की झीनत बाघित अब ओडिशा और झारखंड के वन विभाग को छका रही है। इसके चलते दोनों राज्यों के वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों का सिरदर्द बढ़ गया है।
क्या है पूरी कहानी ?
झारखंड के जंगलों में भटक गई एक बाघिन “झीनत” को ओडिशा के वन विभाग ने वापस लाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। “झीनत” को महाराष्ट्र के ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व से ओडिशा के सिमिलिपाल टाइगर रिजर्व में लाया गया था। परंतु, प्राकृतिक प्रवृत्ति के चलते उसने झारखंड के जंगलों का रुख कर लिया। वन विभाग रेडियो कॉलर की मदद से उसकी हर गतिविधि पर नजर रखे हुए है।
झीनत का सफर : महाराष्ट्र से झारखंड तक
14 नवंबर को झीनत को महाराष्ट्र से ओडिशा लाकर सिमिलिपाल टाइगर रिजर्व में छोड़ा गया। 25 नवंबर को उसे खुले पिंजरे में छोड़ने के बाद वह दस दिनों तक रिजर्व में रही, लेकिन फिर उसने झारखंड के जंगलों का रुख कर लिया। रेडियो कॉलर ने उसकी लोकेशन साझा की, जिससे पता चला कि वह झारखंड के चकुलिया क्षेत्र में पहुंच चुकी है।
बाघिन को लाने के लिए वन विभाग की योजना
ओडिशा और झारखंड के वन विभाग मिलकर झीनत को वापस लाने की कोशिश में लगे हैं। टीम ने झारखंड के जंगल में झीनत को पकड़ने के लिए तीन भैंसों को चारे के तौर पर रखा है। उसे सुरक्षित तरीके से लाने के लिए एक विशेष पिंजरा तैयार किया गया है।
प्राकृतिक प्रवृत्ति और कृत्रिम पुनर्स्थापन
महाराष्ट्र से ओडिशा लाई गई झीनत ने स्वाभाविक प्रवृत्ति के तहत दूसरे जंगलों का रुख किया। यह स्थिति बताती है कि कृत्रिम पुनर्स्थापन के बावजूद बाघ अपनी प्राकृतिक प्रवृत्तियों से प्रेरित होते हैं।
“मेलानिस्टिक” बाघों का एकमात्र घर
सिमिलिपाल टाइगर रिजर्व में आनुवंशिक विविधता को बढ़ाने के लिए झीनत और एक अन्य बाघिन, यमुना, को स्थानांतरित किया गया। यह रिजर्व भारत में “मेलानिस्टिक” (काले रंग के) बाघों का एकमात्र घर है, जिसे “कंजर्वेशन क्लस्टर” के रूप में मान्यता प्राप्त है।
आनुवंशिक विविधता को बढ़ावा देने की पहल
ताडोबा-अंधारी रिजर्व से सिमिलिपाल में बाघिनों को लाने का मुख्य उद्देश्य यहां बाघों की संख्या और आनुवंशिक विविधता को बढ़ाना है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने इस परियोजना को स्वीकृति दी थी।
असर और भविष्य की राह
झीनत की झारखंड तक की यात्रा न केवल बाघों के प्राकृतिक व्यवहार को उजागर करती है, बल्कि कृत्रिम पुनर्स्थापन के जटिल पहलुओं को भी सामने लाती है। अब, वन विभाग की चुनौती है कि उसे वापस सिमिलिपाल लाकर वहां की जैव विविधता को बनाए रखा जाए।










