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सोमय्या के 17 विश्व शांतिदूतों को राष्ट्रीय कार्य से एलर्जी

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■ जनगणना कार्य ठुकराने वाले 17 शिक्षकों पर FIR दर्ज
■ गिनीज बुक में नाम रोशन करने वाले संचालक पांढुरंग आंबटकर ने साध ली चुप्पी

चंद्रपुर।
चंद्रपुर में शिक्षा के नाम पर आदर्श और संस्कारों की बड़ी-बड़ी बातें करने वाली संस्थाओं की वास्तविकता अब एक-एक कर सामने आने लगी है। एक ओर सोमय्या शैक्षणिक संस्था पर पहले से ही छात्रों को फीस वसूली के लिए प्रताड़ित करने के आरोप लगे थे, वहीं अब इसी समूह से जुड़े कर्मचारियों और शिक्षकों पर राष्ट्रीय जनगणना कार्य से बचने तथा सरकारी आदेशों की अवहेलना करने के आरोप में F.I.R. दर्ज होने से पूरे शिक्षा जगत में खलबली मच गई है। आश्चर्य की बात है कि यही वह संस्था व शिक्षक हैं, जो चंद रोज पहले वैश्विक युद्ध को रोकने के लिए शांतिदूत बनने का दंभ भरते रहे। गिनीज बुक में अपने संस्था का नाम दर्ज कराने के लिए नृत्य आविष्कार करते रहें।
सबसे गंभीर बात यह है कि जिन शिक्षकों और कर्मचारियों पर राष्ट्र के सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक कार्यों में से एक – जनगणना का दायित्व निभाने का भरोसा किया गया था, उन्हीं में से 17 लोगों ने नियुक्ति पत्र लेने से लेकर प्रशिक्षण में शामिल होने तक से दूरी बना ली। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जिम्मेदारी के प्रति असंवेदनशीलता का गंभीर उदाहरण माना जा रहा है। ये कथित देशभक्त 17 शिक्षकों की करतूत पर संस्था के प्रमुख पांढुरंग आंबटकर ने चुप्पी साध ली है।

🔴 ‘विश्व शांतिदूत’ की छवि और जमीन पर सवालों का अंबार
सोमय्या समूह के संचालक पांढुरंग आंबटकर ने अपने सामाजिक अभियानों और रिकॉर्ड आधारित गतिविधियों के जरिए सार्वजनिक छवि बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। गिनीज बुक में नाम दर्ज होने और ‘विश्व शांतिदूत’ जैसे विशेषणों के प्रचार के बीच अब यह प्रश्न उठ रहा है कि यदि संस्था वास्तव में सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रसेवा के मूल्यों पर चलती है, तो फिर उसी संस्था से जुड़े कर्मचारी राष्ट्रीय जनगणना जैसे संवैधानिक कार्य से क्यों भागते दिखाई दिए ?
इस पूरे मामले में सबसे अधिक चौंकाने वाली बात पांढुरंग आंबटकर की चुप्पी है। जब संस्था पर छात्रों के शोषण के आरोप लगे, तब भी स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया। अब राष्ट्रीय कर्तव्य से कथित रूप से दूरी बनाने वाले कर्मचारियों पर FIR दर्ज होने के बाद भी प्रबंधन मौन है।

🔴 क्या यह मौन नैतिक जिम्मेदारी से बचने का प्रयास है ?
क्या संस्था प्रशासन अपने कर्मचारियों की कार्यसंस्कृति पर नियंत्रण खो चुका है?
या फिर शिक्षा संस्थान अब केवल फीस वसूली और प्रचार आधारित छवि निर्माण तक सीमित होकर रह गए हैं?

🔴 छात्रों ने पहले ही खोली थी प्रबंधन की कार्यप्रणाली की पोल
यह वही संस्था है जिसके खिलाफ बी.ए.एम.एस प्रथम वर्ष के सैकड़ों छात्रों ने फीस वसूली को लेकर गंभीर प्रताड़ना के आरोप लगाए थे। छात्रों का कहना था कि शिक्षा के बजाय आर्थिक दबाव का वातावरण बनाया जा रहा है।
20 जून 2025 को ओबीसी सेवा संघ चंद्रपुर के जिलाध्यक्ष अनिल डहाके के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचकर महाराष्ट्र शिक्षण प्रसारक मंडल तथा संस्था संचालक पांढुरंग आंबटकर के खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई थी।
उस समय भी सवाल उठा था कि क्या निजी शिक्षण संस्थाएं शिक्षा को सेवा नहीं बल्कि व्यवसाय मानकर चल रही हैं?
अब जनगणना प्रकरण ने इन सवालों को और गंभीर बना दिया है।

🔴 जनगणना जैसे राष्ट्रीय कार्य से दूरी आखिर क्यों ?
भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा संचालित जनगणना 2026-27 केवल सरकारी औपचारिकता नहीं है। यही प्रक्रिया देश की विकास योजनाओं, संसाधनों के वितरण, सामाजिक संरचना, आर्थिक नीतियों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की आधारशिला मानी जाती है।
ऐसे महत्वपूर्ण कार्य के लिए शिक्षकों और तकनीकी कर्मचारियों को पर्यवेक्षक तथा प्रगणक के रूप में नियुक्त किया गया था। लेकिन आरोप है कि संबंधित कर्मचारियों ने नियुक्ति पत्र स्वीकारने में टालमटोल की और प्रशिक्षण कार्यक्रमों से भी दूरी बनाई।

🔴 यह व्यवहार कई गंभीर सवाल खड़े करता है –
➤ क्या शिक्षकों में अब राष्ट्रीय जिम्मेदारियों के प्रति संवेदनशीलता समाप्त होती जा रही है?
➤ क्या निजी संस्थानों का वातावरण कर्मचारियों को केवल संस्थागत हित तक सीमित कर रहा है?
➤ क्या कुछ शिक्षण संस्थानों में सरकारी कार्यों के प्रति नकारात्मक मानसिकता विकसित हो रही है?

🔴 मनपा प्रशासन का सख्त संदेश
चंद्रपुर महानगरपालिका प्रशासन ने इस मामले में असामान्य कठोरता दिखाते हुए संबंधित 17 कर्मचारियों के खिलाफ रामनगर पुलिस स्टेशन में आपराधिक प्रकरण दर्ज कराया।
सहायक आयुक्त राहुल पंचबुद्धे और अन्य अधिकारियों की शिकायत के आधार पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 223(ए) तथा लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के तहत कार्रवाई की गई।
प्रशासन का स्पष्ट संदेश है कि राष्ट्रीय कार्यों में लापरवाही अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
भद्रावती में भी मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्य में कथित लापरवाही बरतने वाले एक शिक्षक पर मामला दर्ज होना यह दर्शाता है कि सरकार और प्रशासन अब चुनाव तथा जनगणना जैसे कार्यों को लेकर अधिक कठोर रुख अपना रहे हैं।

🔴 सबसे अधिक नाम सोमय्या कॉलेज से जुड़े होने पर उठे सवाल
जिन कर्मचारियों पर कार्रवाई हुई उनमें बड़ी संख्या सोमय्या पॉलिटेक्निक कॉलेज से जुड़े लोगों की बताई जा रही है। यही तथ्य पूरे विवाद को और संवेदनशील बना देता है। यदि किसी एक संस्थान से जुड़े कर्मचारियों का नाम बार-बार प्रशासनिक विवादों में सामने आता है, तो यह केवल व्यक्तिगत गलती नहीं बल्कि संस्थागत कार्यसंस्कृति पर भी प्रश्नचिह्न बन जाता है।
शिक्षा संस्थानों का उद्देश्य केवल डिग्री बांटना नहीं होता, बल्कि नागरिक जिम्मेदारी, अनुशासन और संवैधानिक मूल्यों का संस्कार देना भी होता है। यदि वही संस्थान राष्ट्रकार्य के प्रति उदासीनता का केंद्र बन जाएं, तो यह समाज के लिए चिंताजनक संकेत है।

🔴 किन-किन पर दर्ज हुई FIR ?
रामनगर पुलिस ने इस मामले में भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 223 (ए) एवं लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950, 1951 व 1989 की धारा 32 के तहत अपराध दर्ज किया है। इनमें सोमय्या कॉलेज के 17 कर्मचारियों को आरोपी बनाया गया है। इनमें किरणकुमार पी. मोहोडे, प्रतिक दातार के अलावा आयुशी मोहित बचिकवार (32), तरुण लक्ष्मण लखम (27), अमित देवराव ठाकरे (37), आशिष भरडकर (34), सोनम अशोक रेवडकर (36), दिशा निलकंठ रघटाटे (29), कमलेश मनोहर ठाकरे (36), नैनसी बबन राऊत (25), नितेश के चव्हाण (36), पूजा जयंत गर्जलावार (32), सीमा शत्रुघ्न गुरनुले (37), तृप्ती नत्थुजी इकरे (30), वैष्णवी हेमंतकुमार मुजारी (24), नौशाद ए सिद्दीकी (36), संतोष मानबेंद्र (29) का समावेश हैं।  

🔴 शिक्षा या केवल ब्रांडिंग?
आज कई निजी शिक्षण संस्थाएं बड़े-बड़े सामाजिक अभियानों, रिकॉर्ड, सम्मान और प्रचार के माध्यम से अपनी छवि चमकाने में लगी हैं। लेकिन जब वास्तविक सामाजिक जिम्मेदारी निभाने की बारी आती है, तब तस्वीर बदलती दिखाई देती है।
एक ओर छात्र फीस प्रताड़ना की शिकायत कर रहे हैं, दूसरी ओर शिक्षक राष्ट्रीय कार्यों से दूरी बनाते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या शिक्षा संस्थानों का मूल उद्देश्य अब केवल ब्रांडिंग और आर्थिक विस्तार बनकर रह गया है?
यदि संस्था प्रशासन अपने कर्मचारियों में राष्ट्रीय कर्तव्य भावना विकसित नहीं कर पा रहा, तो फिर ‘विश्व शांतिदूत’ और ‘सामाजिक प्रतिबद्धता’ जैसे दावे केवल प्रचारात्मक नारों तक सीमित दिखाई देते हैं।

📢 अब जवाब कौन देगा?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि –
➤ क्या पांढुरंग आंबटकर सार्वजनिक रूप से अपनी भूमिका स्पष्ट करेंगे?
➤ क्या संस्था कर्मचारियों की कथित लापरवाही पर आंतरिक जांच करेगी?
➤ क्या छात्रों की शिकायतों और जनगणना प्रकरण के बीच किसी व्यापक संस्थागत अव्यवस्था की जांच होगी?
➤ क्या शिक्षा विभाग निजी संस्थानों की कार्यसंस्कृति की समीक्षा करेगा?
चंद्रपुर में यह मामला अब केवल 17 कर्मचारियों की FIR तक सीमित नहीं रह गया है। यह निजी शिक्षा संस्थानों की जवाबदेही, राष्ट्रीय दायित्व और शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य पर बड़ा सार्वजनिक प्रश्न बन चुका है।

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