■ पेट्रोल पंपों से ग्राहकों के हक का डीजल गायब
■ औद्योगिक इकाइयों को बेचने का भ्रष्ट खेल शुरू
■ ₹140 का डीजल उद्योगों को बांट रहे ₹110 में
चंद्रपुर।
बीते दिनों जिलाधिकारी वसुमना पंत ने गैस सिलेंडर की आपूर्ति में बरती जा रही लापरवाही को लेकर औचक निरीक्षण किया। संबंधितों को कड़े निर्देश दिए। लेकिन अब चंद्रपुर जिले में लाखों-करोड़ों के डीजल की कालाबाजारी होने की विश्वसनीय जानकारी मिली है। चंद्रपुर जिले के पेट्रोल पंपों पर मौजूद खुदरा (रिटेल) डीजल, जो आम ग्राहकों के वाहनों के लिए उपलब्ध कराया जाता है, जिसका वर्तमान बाजार मूल्य 90 रुपये 90 पैसे है। आम ग्राहकों के हक के इस डीजल को WCL क्षेत्र में मिट्टी खुदाई करने वाली कंपनियों, MIDC के उद्योगों, बड़े औद्योगिक इकाइयों को अवैध रूप से 110 रुपये की कीमत पर बेचा जा रहा है। सूत्र बताते हैं कि चंद्रपुर के पेट्रोल पंपों का डीजल सूरजागढ़ की मशीनों व ट्रकों तक भी पहुंच रहा है। जबकि इन्हें 140 रुपये के हिसाब से डीजल खरीदने का प्रावधान है। परंतु औद्योगिक इकाइयों एवं पेट्रोल पंप संचालकों की मिलीभगत से डीजल की कालाबाजारी जमकर फल-फूल रही है। संबंधित जिलाधिकारी वसुमना पंत, जिला प्रशासन एवं जिला आपूर्ति अधिकारी राहुल बहादूरकर क्या इस महाघोटाले पर लगाम कस पाएंगे ? क्या वे भ्रष्ट पेट्रोल पंपों की गहनता से जांच करा पाएंगे ?
■ प्रति लीटर 50 रुपये लूटने का खेल समझिए…
औद्योगिक इकाइयों की मशीनों व वाहनों के लिए तय अनुसार 140 रुपये के हिसाब से डीजल खरीदना पड़ता है। वर्तमान में पेट्रोल पंपों पर आम ग्राहकों के लिए डीजल करीब 90 रुपये के हिसाब से मिलता है। अब यदि आम ग्राहकों के हक का डीजल पेट्रोल पंप धारक 110 रुपये के हिसाब से औद्योगिक इकाइयों को बेचेंगे तो पेट्रोल पंपों को 20 रुपये का अतिरिक्त भ्रष्ट लाभ मिलेगा और औद्योगिक इकाइयों को 30 रुपये का अतिरिक्त फायदा। यह लाभ कम-ज्यादा प्रमाण में हो सकता है। लेकिन सबसे भ्रष्ट नीति तो यही है कि ग्राहकों के हक का डीजल औद्योगिक इकाइयों को बेचकर करोड़ों का भ्रष्टाचार किए जाने की जानकारी सूत्रों के हवाले से मिल रही है। इस पर जिला प्रशासन की ओर से लगाम कसना अनिवार्य है।
■ जिला प्रशासन क्यों बैठा है शांत ?
डीजल की कालाबाजारी, अवैध भंडारण, औद्योगिक उपयोग के नाम पर रिटेल डीजल की हेराफेरी और पेट्रोल पंपों से सीधे औद्योगिक इकाइयों तक पहुंचने वाले डीजल की अवैध बिक्री रोकने के लिए राज्य सरकार, जिलाधिकारी तथा जिला आपूर्ति विभाग के पास व्यापक कानूनी अधिकार मौजूद हैं। परंतु इस पर स्थानीय जिला प्रशासन का ध्यान नहीं है।
■ कानून है, लेकिन अमल क्यों नहीं ?
यह पूरा तंत्र मुख्यतः Essential Commodities Act, 1955, Petroleum Act, 1934, Petroleum Rules, 2002 तथा विभिन्न राज्य स्तरीय नियंत्रण आदेशों के तहत काम करता है।
■ डीजल की कालाबाजारी रोकने के प्रमुख कानून
1. Essential Commodities Act, 1955
डीजल और पेट्रोल को आवश्यक वस्तु (Essential Commodity) माना जाता है। इस कानून के तहत सरकार को अधिकार है कि भंडारण सीमा तय करे, आपूर्ति नियंत्रित करे, कालाबाजारी रोकने कार्रवाई करे, लाइसेंस रद्द करे, जब्ती और गिरफ्तारी करे।
यदि कोई व्यक्ति रिटेल डीजल को अवैध रूप से उद्योगों को बेचता है, फर्जी बिलिंग करता है, स्टॉक छुपाता है, कृत्रिम कमी पैदा करता है, तो उसके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज हो सकता है।
2. Petroleum Act, 1934 और Petroleum Rules, 2002
इन नियमों के अनुसार डीजल का भंडारण, परिवहन, वितरण, सुरक्षा मानक, लाइसेंस प्रणाली सभी नियंत्रित होते हैं।
बिना अनुमति बड़ी मात्रा में डीजल स्टोर करना, अवैध टैंकर संचालन, लाइसेंस से अलग उपयोग, अनधिकृत बल्क सप्लाई गंभीर अपराध माने जाते हैं।
■ जिलाधिकारी के अधिकार क्या हैं ?
जिलाधिकारी जिले में सबसे बड़े कार्यकारी एवं दंडाधिकारी अधिकारी होते हैं। उनके पास निम्न अधिकार होते हैं — जैसे कि छापेमारी (Raid) का आदेश। कलेक्टर, SDM, तहसीलदार, आपूर्ति विभाग, पुलिस, वजन एवं माप विभाग की संयुक्त टीम बनाकर पेट्रोल पंप, गोदाम, उद्योग, टैंकर पर छापे डलवा सकते हैं।
लाइसेंस निलंबित / रद्द करना — यदि जांच में पाया जाए कि रिटेल डीजल डाइवर्शन हुआ, रिकॉर्ड फर्जी है, स्टॉक मिसमैच है, तो जिलाधिकारी स्वयं पेट्रोल पंप का लाइसेंस निलंबित कर सकते हैं। तेल कंपनी को कार्रवाई की अनुशंसा कर सकते हैं। इसके अलावा डीजल जब्त करना, अवैध भंडारण या परिवहन पाए जाने पर टैंकर, ड्रम, स्टॉक जब्त किए जा सकते हैं।
वहीं FIR और गिरफ्तारी को लेकर भी जिलाधिकारी के पास अधिकार हैं। जिलाधिकारी आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत पुलिस FIR दर्ज करा सकते हैं, आपराधिक कार्रवाई शुरू करा सकते हैं। जिले में कृत्रिम कमी या कालाबाजारी होने पर बिक्री सीमा, बल्क सप्लाई मॉनिटरिंग, मूवमेंट रिस्ट्रिक्शन जैसे आदेश जारी कर सकते हैं।
■ जिला आपूर्ति अधिकारी (DSO) की जिम्मेदारी क्या है ?
DSO इस पूरे तंत्र का प्रमुख फील्ड अधिकारी होता है। पेट्रोल पंप निरीक्षण, स्टॉक रजिस्टर जांचना, बिक्री रिकॉर्ड मिलान, टैंकर रिसीप्ट वेरिफिकेशन, POS मशीन डेटा जांच भी करना होता है। स्टॉक ऑडिट भी DSO को जांचना होता है। कितना डीजल आया ?, कितना बिका ?, कितना शेष है ? यदि अंतर मिलता है तो कार्रवाई की जा सकती है।
बल्क सप्लाई की निगरानी में विशेषकर खदान, उद्योग, बिजली प्रकल्प, निर्माण कंपनियों को होने वाली सप्लाई की निगरानी करना होता है। यदि शिकायत मिले कि पंप पर डीजल नहीं, लेकिन उद्योगों को सप्लाई जारी है तो कालाबाजारी और उसकी दर की तत्काल जांच करना DSO की जिम्मेदारी है। गंभीर अनियमितता पाए जाने पर जांच रिपोर्ट तैयार करना, लाइसेंस निलंबन प्रस्ताव, FIR का प्रस्ताव उन्हें कलेक्टर को भेजना चाहिए।
■ किन परिस्थितियों में कालाबाजारी मानी जाती है ?
यदि रिटेल पंप पर “डीजल खत्म” दिखाया जाए, लेकिन पीछे से उद्योगों को सप्लाई हो, नकद में बिना बिल बिक्री हो, बल्क डीजल को रिटेल स्टॉक से बेचा जाए, ₹90 वाले डीजल को ₹110–140 में डाइवर्ट किया जाए, स्टॉक रजिस्टर और वास्तविक स्टॉक अलग मिले, तो यह कालाबाजारी, diversion और Essential Commodities Act का उल्लंघन माना जा सकता है।
■ Collector क्या-क्या विशेष कार्रवाई कर सकते हैं ?
कलेक्टर को ऐसी परिस्थितियों में संयुक्त विशेष अभियान चलाना चाहिए। पुलिस, आपूर्ति विभाग और ऑयल कंपनियों के साथ मिलकर GPS मॉनिटरिंग, टैंकर मूवमेंट ट्रैकिंग, औचक निरीक्षण, रात में औचक जांच के अलावा सेल्स डेटा मूल्यांकन किया जा सकता है। ऑयल कंपनियों को निर्देश देकर बल्क सप्लाई रिकॉर्ड की मांग कर सकते हैं।
यदि कोई पेट्रोल पंप संचालक दोषी पाए जाते हैं तो उनका लाइसेंस रद्द, भारी जुर्माना, स्टॉक जब्ती, जेल, Essential Commodities Act के तहत prosecution संभव है।
■ महत्वपूर्ण तथ्यों पर ध्यान देना चाहिए
➤ जिलाधिकारी जिले में Essential Commodities नियंत्रण के सर्वोच्च अधिकारी माने जाते हैं।
➤ जिला आपूर्ति अधिकारी उनकी निगरानी में काम करता है।
➤ तेल कंपनियों को भी संदिग्ध बिक्री पर कार्रवाई करनी होती है।
➤ यदि प्रशासन चाहे तो 24–48 घंटे में बड़े स्तर की जांच शुरू हो सकती है।










