■ रिपोर्टर विकास राजुरकर के ग्राउंड रिपोर्ट से खुली पोल
■ 13 वर्षों की मांग, 66 लाख खर्च, उद्घाटन के बाद से ही बंद और मरीजों को जाना पड़ता है 25 किमी दूर
चंद्रपुर.
🚨 चंद्रपुर के निंबाला गांव में स्वास्थ्य केंद्र का उद्घाटन बनाम मरीजों की दर्दनाक हकीकत
चंद्रपुर जिले के निंबाला गांव में एक आरोग्य उपकेंद्र का उद्घाटन बड़े धूमधाम से किया गया, लेकिन उसके दरवाज़े अब तक ताले से जकड़े हुए हैं। यह घटना न केवल एक प्रशासनिक असफलता का प्रतीक है, बल्कि ग्रामीण स्वास्थ्य प्रणाली की गहराई से उपेक्षा का जीता-जागता उदाहरण भी बन चुकी है। इसकी सच्चाई को ग्राउंड रिपोर्ट के माध्यम से ‘मुंबई तक’ के रिपोर्टर विकास राजुरकर ने उजागर किया है। इससे संबंधित वीडियो भी उन्होंने अपने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर इसकी पोल खोल दी है।
🏥 उम्मीदों का केंद्र बना ‘बंद दरवाज़ा’
🔹 13 वर्षों की मांग के बाद बनी इमारत – निंबाला गांव में वर्षों से स्वास्थ्य केंद्र की मांग की जा रही थी। 66 लाख रुपये की लागत से नई इमारत का निर्माण हुआ।
🔹 भव्य उद्घाटन, पर फिर ताला – चुनाव से ठीक पहले स्थानीय विधायक ने धूमधाम से उद्घाटन किया, लेकिन कुछ ही समय बाद आरोग्य विभाग ने इस इमारत को बंद कर दिया।
🔹 उद्घाटन के दिन सजावट, फिर सब गायब – उद्घाटन के दिन बेड, दवाएं और आवश्यक उपकरण रखे गए थे, लेकिन उसके तुरंत बाद सब कुछ हटा लिया गया।
🧍♂️ ग्रामीणों की परेशानी और सिस्टम की चुप्पी
🔸 755 लोगों की आबादी, इलाज के लिए 25 किमी का सफर – निंबाला गांव के लोगों को आज भी गंभीर बीमारियों के लिए चंद्रपुर जिला अस्पताल तक जाना पड़ता है।
🔸 न एम्बुलेंस, न सरकारी सुविधा – गांव में एम्बुलेंस सेवा नहीं है। मरीजों को निजी वाहनों से जाना पड़ता है, जो आर्थिक रूप से बोझिल साबित होता है।
🔸 डायरिया का प्रकोप और बंद अस्पताल – पिछले हफ्ते गांव में डायरिया फैला, लेकिन केंद्र बंद होने के कारण मदद नहीं मिल सकी।
👵 बुज़ुर्गों, महिलाओं और बच्चों की दुर्दशा
🔹 80 वर्षीय गोकुल श्रीवास्तव – “जीवन में पहली बार दवाखाना बना, पर वह भी बंद है।”
🔹 65 वर्षीय बबन कोकोडे – “घुटनों में दर्द से चलना मुश्किल, इलाज के लिए शहर जाना मजबूरी।”
🔹 महिलाओं और बच्चों की हालत – इलाज न मिल पाने से समय पर देखभाल नहीं हो पा रही, जिससे जटिलताएं बढ़ रही हैं।
🗣️ सरपंच की चिंता और अधिकारियों की असमर्थता
🔸 सरपंच सौरभ दुपारे – “कई बार आरोग्य विभाग से अनुरोध किया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।”
🔸 जिला आरोग्य अधिकारी अशोक कटारे की स्वीकारोक्ति – “उद्घाटन हुआ, लेकिन स्टाफ की कमी के कारण ताला लगा। सरकार को प्रस्ताव भेजे 7 महीने हो चुके, लेकिन अब तक जवाब नहीं आया।”
🔸 जिले में ऐसे तीन उपकेंद्र और भी बंद – यह समस्या निंबाला तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलती है।
❓ जिम्मेदारी किसकी ? जवाब कौन देगा ?
🔹 क्या यह सिर्फ प्रशासनिक गलती है ? – या फिर यह उस सरकारी संवेदनहीनता का नमूना है जो ग्रामीण भारत के नागरिकों के जीवन को महत्वहीन मानती है ?
🔹 क्या यह लोकतंत्र की विफलता नहीं है ? – जब वोटों के लिए उद्घाटन होते हैं, लेकिन जीवन बचाने के लिए कोई कर्म नहीं।
🔹 355 उपकेंद्रों की वास्तविक स्थिति पर सवाल – कितने केंद्रों में डॉक्टर हैं ? कितने शुरू हैं ? ये आंकड़े सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते ?
📢 गांव की मांग – आरोग्य केंद्र तुरंत शुरू हो !
➤ पूरी चिकित्सा सुविधा सहित उपकेंद्र की तत्काल शुरुआत की जाए।
➤ डॉक्टर, नर्स और दवाओं की नियमित व्यवस्था हो।
➤ गांव के लिए एम्बुलेंस सेवा सुनिश्चित की जाए।
🔍 अंतिम बात : ‘स्वास्थ्य’ बनाम ‘राजनीति’ का खेल
➤ निंबाला का यह बंद दवाखाना पूरे सरकारी तंत्र को कठघरे में खड़ा करता है। जनता के नाम पर उद्घाटन, लेकिन जनता के लिए दरवाज़ा बंद – यह सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि देश के सैकड़ों गांवों की चीख है, जिसे अब अनसुना नहीं किया जाना चाहिए।
👉 जब तक निंबाला जैसे गांवों के दरवाज़े सच में इलाज के लिए नहीं खुलते, तब तक उद्घाटन महज ‘राजनीतिक इवेंट’ ही रहेगा।